रेत
कुछ सवाल युही ख्याल की तरह , उमरते रहे जहन में . आँखें खोजती रही; खुद में खुद को जब तक . महज सवालों में घिरे रहे , और खोये रहे जवाब ; घडियो के दरम्या तब तक . और बहस अब हार जाने की नहीं हैं. बस इतनी सी तो हैं ... के तमन्नाओ के घरोंदे से झांकती उम्मीदे , अब रेत हो गयी हैं . .......रेत हो गयी हैं , घुल गयी हैं तमाम शहर में ऐसे ... के इनके जर्रो में ; मैं पहचानी न जा रही हु . बस पर गए हैं कदम के निशाँ कुछ दूर तक ...