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वरदान

आज सदियों के बाद पसरा ये सन्नाटा देखती हु  आज सर उठा के देखा हैं रजिस्टर के बाहर  लोग नहीं हैं उतनी परेशानी में जितना देखा करती थी होठ काँप रहे हैं सबके  मेरे कानो में कोई आवाज नहीं पड़ती . हाँ पर फाइलों में परे हैं आज भी मेरे सारे शब्द बेआवाज  पपेरवेट के निचे दबा के रखी हो जैसे जिन्दगी कि किताब और कंधो  पे ये अहम का बोझ उतना नहीं  जितना ऐसे ही जीते रहने की ईच्छा हैं शायद ... इसलिए तो सोचती हु अपने लिए ये वरदान मैंने स्वयं ही तो माँगा था ठीक वैसे ही जैसे घोर तपस्या से भागीरथ ने गंगा को धरा पे उतारा था ये लहर कौन थाम पाता हैं सहज दिन ऐसे ही ढलता हैं इसी में सुकून हैं शायद सड़क की और देखना देखना बच्चो को लरते हुए और अपने बचपन का रंग उतरते हुए ...