बेफिक्र
बेफिक्र परिंदे थे मेरे बचपन के शहर से कुछ देर मुस्कुरा के जो मेरे चेहरे से उड़ गए ... चेहरे... चेहरे ... चेहरे ... बारहम इतने मेरे जिंदगी में कुछ लोग भी थे ! वो किधर गए ? सारी रात करते रहेंगे उनकी नज़्म की बातें ये क्या मकाम हैं की जॉन दिल में उतर गए। बिन बुलाए आधी रात देकर आंखो में दस्तक वो क्या दर्द थे की मेरे घर में ठहर गए । तुम भी मुस्कुरा लो हाल ए जिदंगी पे अब, की रोने रुलाने के तो अब मौसम गुजर गए।