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बेफिक्र

बेफिक्र परिंदे थे मेरे बचपन के शहर से कुछ देर मुस्कुरा के जो मेरे चेहरे से उड़ गए ... चेहरे... चेहरे ... चेहरे ... बारहम इतने  मेरे जिंदगी में कुछ लोग भी थे ! वो किधर गए ? सारी रात करते रहेंगे उनकी नज़्म की बातें ये क्या मकाम हैं की जॉन दिल में उतर गए। बिन बुलाए आधी रात देकर आंखो में दस्तक वो क्या दर्द थे की मेरे घर में ठहर गए । तुम भी मुस्कुरा लो हाल ए जिदंगी पे अब, की रोने रुलाने के तो अब मौसम गुजर गए।

नदी

मेरा प्रेम गंगा था ... भागीरथ ... जिसे तुम उतार लाए  मेरे अवचेतन से बाहर कहा था मैंने  संभाल नहीं पाओगे ये लहर तुम सहज तुम्हे जब थामना था मुझे हाथ छुड़ा लिया तुमने ... मैंने स्वयं ही ये गरल भी पीना था और इस नदी को भी थामना था, इस तरह मैं ही बनी नीलकंठ भी ... भागीरथ...

पहली बारिश

पहली बारिश, और वो मुलाकात याद आएगी  तुमने जो अवाज से अपनी  बारिश जलायी थी ना, जल रहीं हैं अब भी , ये आंच कैसे बुझाई जाएगी... बरसों पुरानी बुझी सिगरेट  शायद फिर से जलायी जाएगी| बारिश को सिरहाने रख  होठों से लगाएंगे, फिर भी तेरा बरस के यु लौट जाना  कैसे भुला पाएंगे|