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नदी

मेरा प्रेम गंगा था ... भागीरथ ... जिसे तुम उतार लाए  मेरे अवचेतन से बाहर कहा था मैंने  संभाल नहीं पाओगे ये लहर तुम सहज तुम्हे जब थामना था मुझे हाथ छुड़ा लिया तुमने ... मैंने स्वयं ही ये गरल भी पीना था और इस नदी को भी थामना था, इस तरह मैं ही बनी नीलकंठ भी ... भागीरथ...