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सूरज के घर में रहना था

तुमको चांद की तलब थी अगर फिर तो सूरज छुपा के रखना था । अगर मन में इतने दाग थे तो फिर तो चेहरा छुपा के रखना था ।  वो बारिश का लुत्फ क्या लेते जिनको राशन जुटा के रखना था । हम तो वहा भी चुप थे जहा हक था की दिल खोल कर के रखना था । हम तो फूलो से बारहां उलझे जबकि सूरज के घर में रहना था ।

नही हैं !

ये किस सफर में हम हैं की सफर हम में नही हैं । कहते हैं खुशामदीद  जब हो मलाल में । सारे हैं मगर बस ये हुनर हम में नही हैं। तुमको बहुत सलीकेदार  लगती हैं ये दुनिया ये दुनिया हैं दुनिया कोई मेहर हम में नही हैं । हम क्यू मलाल रखेंगे अब उसकी बात का  जब उसकी बात का  कोई असर हम पे नहीं हैं । तुमको भी खुदगर्ज  लगती हैं ये दुनिया ? जबकि इखलास का जरा भी असर तुम में नही हैं । ये किस सफर में हम हैं की सफर हम में नही हैं ।

अनकही

 शब्दो से परे कुछ गहरे एहसास मिट्टी में बोए बीजो की तरह नही आते सतह तक कभी मिट्टी की ठसक कभी नरमी की कमी कभी धूप से अलग पनप उठते है किसी अलमारी के पुरानी डायरी मे कभी काफी के प्याले के तैरती भाप में  दिलो के बीच की चुप झांकती हैं ऐसे ही कुछ अनकही न कहने से जिंदा रहती है  ।