सूरज के घर में रहना था
तुमको चांद की तलब थी अगर
फिर तो सूरज छुपा के रखना था ।
अगर मन में इतने दाग थे तो
फिर तो चेहरा छुपा के रखना था ।
वो बारिश का लुत्फ क्या लेते
जिनको राशन जुटा के रखना था ।
हम तो वहा भी चुप थे जहा
हक था की दिल खोल कर के रखना था ।
हम तो फूलो से बारहां उलझे
जबकि सूरज के घर में रहना था ।
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