बेड़ियाँ रेशम की नही
लोहे की ही होती हैं ।

पहना देते हैं उसे
 रेशम मे लपेट कर

ज़मीन से लगे  हैं कदम
नापते रहने को राशन की तरह
ख्वाहिशों का हिसाब

उंगलियाँ फिर भी फिरती हैं
दीवारो पर
 जैसे साँस लेने को
कोई दरार उभर आएगी

साँस जैसे धुआँ
सिगरेट की तरह ऐश ट्रे मे
बुझी

एहसास सा आता हैं।
नसरीन की तरह
अफीम लेकर
दीवारों के उपर उड़ने का

धम्म से आ गिरती हैं  ,
सिरहाने एक आवाज़
"निर्लज्ज" !

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