नींद आँखों में आती नहीं
हम फिर भी सो जाते हैं .

दिन फिर वही मिलता है
जहां हम छोड़ आते है।

के इस मोड़ पे जिंदगी
हैं ख्वाब देखती कई
पलकों को छू के चांदनी
हैं दूर जा सिमटी कही

वो चांदनी मरीचिका
आँखों में सिमटी ही नहीं
कर दफ्न सीने में कही
सपनो को किनारे छोड़ आते हैं।

ख्वाबो से अपने रूठ कर
ये सांस थमती हैं कहीं...
तीनो पहर भाग कर
आ लौट पड़ती है यही ।

वो धडकना लफ्ज़ का
वो मचलना हर्फ़ का
आँखों  में कितने बोल थे
जैसे ठिठुरना सर्द का

ये फजाए बिन कहे अब कुछ बोल पाते  नहीं ...

           

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