दिन  की भागदौड मे
अनायास ही
किताबो को रैक से उतारते हुए
कपडे़ की उखडी़ सिलाई जोड़ते हुए
कुछ जरूरी पेपर्स को प्रिन्ट होते निकलते देखते हुए
ऐसे ही यू ही कभी
अति सूक्ष्म पलो मे
तुम्हारा उभर कर सामने आ जाना
और फिर ये याद ना आना
कि ये याद तुमपे कैसे मुड़ी ...

अहसास दिलाता है
कि तुम हो तो नही
पर मै हूं... मै हूं ...
और इस हाल पे छुप के
बरसो से जो रोना है
तुम्हारे ना होने मे
जो ये होना है ।
यही बेचैनी है...
यही सुकुन है बस।


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