अखबार
हर रात
तुम्हारी ख़ामोशी को
मैं चांद सा सोचा करू
हर सुबह बिखरी किरणों सा तुम्हें
धुप धुप सेका करू।
हर भोर तुम्हें पढ़ा करू
हर कोर तुम्हें लिखा करू
और तुम मुस्कुरा कर पढ़ो मेरे
अरमानों का इश्तहार
चलो ना ...
बन जाते हैं
एक दूसरे का अखबार ।
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