तुमको चांद की तलब थी अगर फिर तो सूरज छुपा के रखना था । अगर मन में इतने दाग थे तो फिर तो चेहरा छुपा के रखना था । वो बारिश का लुत्फ क्या लेते जिनको राशन जुटा के रखना था । हम तो वहा भी चुप थे जहा हक था की दिल खोल कर के रखना था । हम तो फूलो से बारहां उलझे जबकि सूरज के घर में रहना था ।
बेफिक्र परिंदे थे मेरे बचपन के शहर से कुछ देर मुस्कुरा के जो मेरे चेहरे से उड़ गए ... चेहरे... चेहरे ... चेहरे ... बारहम इतने मेरे जिंदगी में कुछ लोग भी थे ! वो किधर गए ? सारी रात करते रहेंगे उनकी नज़्म की बातें ये क्या मकाम हैं की जॉन दिल में उतर गए। बिन बुलाए आधी रात देकर आंखो में दस्तक वो क्या दर्द थे की मेरे घर में ठहर गए । तुम भी मुस्कुरा लो हाल ए जिदंगी पे अब, की रोने रुलाने के तो अब मौसम गुजर गए।
ये किस सफर में हम हैं की सफर हम में नही हैं । कहते हैं खुशामदीद जब हो मलाल में । सारे हैं मगर बस ये हुनर हम में नही हैं। तुमको बहुत सलीकेदार लगती हैं ये दुनिया ये दुनिया हैं दुनिया कोई मेहर हम में नही हैं । हम क्यू मलाल रखेंगे अब उसकी बात का जब उसकी बात का कोई असर हम पे नहीं हैं । तुमको भी खुदगर्ज लगती हैं ये दुनिया ? जबकि इखलास का जरा भी असर तुम में नही हैं । ये किस सफर में हम हैं की सफर हम में नही हैं ।
Comments
Post a Comment