दुकान में तह लगा एक सफेद कुर्ता उचक कर दुकानदार के सामने आ गिराऔर नाराजगी से कहा"मुझे तुम होली में भी बेच रहे ईद में भी बेच रहे,मुझे भी कोई रंग और पहचान दो"
दुकानदार ने उसे कहा"तू कुर्ता है अवाम नही और मैं इंसान हूं, सियासतदार नही की जमी से अलग कर कोई और रंग चढ़ा दूं।
सूरज के घर में रहना था
तुमको चांद की तलब थी अगर फिर तो सूरज छुपा के रखना था । अगर मन में इतने दाग थे तो फिर तो चेहरा छुपा के रखना था । वो बारिश का लुत्फ क्या लेते जिनको राशन जुटा के रखना था । हम तो वहा भी चुप थे जहा हक था की दिल खोल कर के रखना था । हम तो फूलो से बारहां उलझे जबकि सूरज के घर में रहना था ।
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