याद है तुम्हें?
जबकि चाय तुम पीते नही थे,
एक अलसायी हुइ दिसंबर की शाम
यूही बैठ गये थे मेरे साथ,
चाय पीने के बहाने।
सुरज तपकर सिंदूरी रंग में पिघल ही रहा था
की तुमने बातो की एक आंच जला दी
वही गर्माहट ओढ़े अपने अपने घरों को लौट आए हम
फिर शाम टूट टूट कर
चाय की खाली प्यालियो में गिरती रही...
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